सत्यव्रत घोष बनाम मँगनी राम बाँगुर एण्ड कम्पनी

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Satyabrata Ghosh vs. Mugnee Ram Bangur & Co. :

  भूमिका – यह वाद पालन की असम्भवता (Impossibility of performance) के आधार पर संविधान के उन्मोचन (discharge) से सम्बन्धित है ।

तथ्य तथा विवाद – इस वाद में प्रत्यर्थी कम्पनी कलकत्ता में एक बहुत बड़े भू-भाग की स्वामिनी थी । उसने उक्त भूमि का विकास करने की एक योजना बनाई तथा यह निश्चय किया कि घरेलू उद्देश्य के लिए एक कालोनी बनाई जाय तथा इस स्कीम का नाम ‘झील कालोनी योजना संख्या एक’ (Lake Colony Scheme No. 1) रखा गया। कम्पनी ने भूमि को अनेक भागों में विभाजित करके अनेक विक्रेताओं से उन प्लाटों का विक्रय करने के लिये उनमे कुछ अग्रिम धन लेकर करार किया । कम्पनी ने यह उत्तरदायित्व लिया कि वह नालियाँ और सडकों आदि को स्वयं बनवायेगी जिससे वे प्लाट मकान आदि बनाने के लिए उपयुक्त होंगे । इन क्रेताओं में से श्री विजयकृष्ण राय भी एक क्रेता थे जिन्होंने एक सौ रुपया अग्रिम धन दिया था । अपीलार्थी श्री विजयकृष्ण राय का समनुदेशिती ( assignee) था । तत्पश्चात् ऐसा घटित हुआ कि उक्त भूमि को जिलाधीश ने भारतीय सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत सैनिक-उद्देश्य के लिए अधिग्रहण कर लिया । इन परिस्थितियों में कम्पनी ने निश्चय किया कि उक्त करारों को रद्द कर दे । अतः उसने अपीलार्थी को यह विकल्प दिया कि या तो वह अपना अग्रिम धन लेकर करार को रद्द कर दे अथवा बकाया धन की देनगी करके करार को पूरा करे । अपीलार्थी ने इन दोनों में से कोई भी विकल्प स्वीकार करने से इन्कार कर दिया तथा कहा कि कम्पनी अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए बाध्य है; अत: अपीलार्थी ने प्रत्यर्थी के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया । वाद का विरोध करते हुए अनेक आधारों के अतिरिक्त कम्पनी ने यह भी आधार लिया कि उसके द्वारा की गई संविदा का उन्मोचन उसके पालन की अमम्भवता के कारण हो गया है ।

निर्णय – तथ्यों तथा परिस्थितियों को देखते हुए उच्चत्तम न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविदा का पालन असंभव नहीं है। न्यायालय ने अपने निर्णय के निम्नलिखित कारण बताये —

(1 ) नवम्बर, 1941 में जब जिलाधीश ने अधिग्रहण के आदेश द्वारा भूमि को अधिग्रहीत किया तो उस समय कम्पनी ने निर्माण-कार्य प्रारम्भ नहीं किया था; अत: कार्य में रुकावट का प्रश्न ही नहीं उठता था ।

( 2 ) सडकों तथा नालियों आदि के निर्माण के लिए कोई समय की सीमा निर्धारित नहीं की गई थी ।

( 3) निर्माण-कार्य में इसलिए भी विलम्ब हुआ आ, क्योंकि निर्माण-सामग्री का अभाव था तथा सरकार द्वारा अनेक नियन्त्रण लगाये गये थे ।

प्रतिपादित नियम – न्यायालय ने संविदा अधिनियम की धारा 56 में प्रयुक्त ‘असम्भव ‘ (impossible) शब्द को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह शब्द अपने शाब्दिक अर्थों में प्रयोग नहीं किया गया है । यदि किसी कार्य का पालन पक्षकारों के उदेश्य को देखते हुए असम्भव को गया है तथा यदि परिस्थितियाँ इस तरह से परिवर्तित हो जाती हैं या वाद की घटनायें ऐसी घटित होती हैं जिनसे कि वह आधार या नींव, जिस पर पक्षकारों ने संविदा की थी, छिन्न-भिन्न हो जाता है, तो यह कहना अनुचित न होगा कि प्रतिज्ञाकर्त्ता द्वारा की गयी प्रतिज्ञा का पालन असम्भव हो जाता है । सर्वोच्च न्यायालय के शब्दों में —

“The word ‘impossible’ has not been used in the sense of physical or literal impossibility. The purpose of an act may be impracticable and useless from the point of view of object and purpose which the parties had in view; and if an untoward event or change of circumstances totally upsets the foundation upon which the parties rested their bargain, it can well be said that the promisor finds it impossible to do the act which he promised to do.”

असम्भवता के सिद्धान्त को स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति बी० के० मुखर्जी (B. K. Mukherjee) ने कहा कि यद्यपि इंग्लैंड में नैराश्य के सिद्धान्त के विधिक आधार को स्पष्ट करते हुए अनेक मत प्रतिपादित किये गये हैं, परन्तु यह सिद्धान्त संविदा के पालन की असम्भवता की विचारधारा पर आधारित है । परिवर्तित परिस्थितियों के कारण यदि संविदा का पालन असम्भव हो जाता है तो संविदा के पक्षकारों को उसके पालन से अभिक्षम्य किया जाता है, क्योंकि उन्होंने कोई असम्भव कार्य करने क्री प्रतिज्ञा नहीं को थी । न्यायमूतिं मुखर्जी के मौलिक शब्दों में —

“Although various theories have been propounded by the judges and jurists in England regarding the judicial basis of the doctrine of frustration, yet the essential idea upon which the doctrine is based is that of the impossibility of performance of contract, in fact impossibility of performance and frustration are eventually used as interchangeable expressions. The changed circumstances, it is said, make the performance of the contract impossible and parties are absolved from the further performance of it as they did not promise to perform an impossibility .”

निष्कर्ष – उपर्युक्त सिद्धान्तों के आधार पर तथा वाद के उद्देश्य तथा परिस्थितियों को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रस्तुत मामले में संविदा का पालन असम्भव नहीं हुआ ।

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