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Preamble (प्रस्तावना) संविधान के परिचय अथवा भूमिका को कहते हैं। इसमें संविधान का सार होता है। प्रख्यात न्यायविद व संवैधानिक विशेषज्ञ एन. ए. पालकीवाला ने प्रस्तावना को संविधान का परिचय पत्र कहा है।

Preamble (प्रस्तावना) की विषयवस्तु
‘हम भारत के लोग, भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए और उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, धर्म, विश्वास व उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता सुनिश्चित कराने वाला, बंधुुुत्व बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित है।’

प्रस्तावना के मुख्य शब्द –
प्रस्तावना में कुछ शब्दों का उल्लेख किय गया है। ये शब्द हैं – संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य, न्याय, स्वतंत्रता, समताबंधुत्व

इनका विस्तार से विवरण निम्नलिखित है –

1. संप्रभुता – संप्रभु शब्द का आशय है कि न तो भारत किसी अन्य देश पर निर्भर है, न किसी देश का डोमिनियन है, इसके ऊपर और कोई शक्ति नहीं है, और वह अपने मामलों (आंतरिक व बाहरी) का निवारण करने के लिए स्वतंत्र है।

2. समाजवाद – वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़े गए इस शब्द का आशय भारतीय समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद है जो मिश्रित अर्थव्यवस्था में आस्था रखता है।
भारतीय समाजवाद मार्क्सवाद और गांधीवाद का मिला जुला रूप है, जिसमें गांधीवादी समाजवाद की तरफ ज्यादा झुकाव है।

3. धर्मनिरपेक्ष – धर्मनिरपेक्ष शब्द को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया। धर्मनिरपेक्ष शब्द का आशय है कि राज्य सभी धर्मों का समान रूप से रक्षा करेेगा व स्वयं किसी धर्म को राज्य का धर्म नहीं मानेगा।

4. लोकतांत्रिक – भारतीय संविधान में प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था है। प्रस्तावना में लोकतांत्रिक शब्द का वृहद अर्थों मेंं प्रयोग हुआ है जिसमें न केवल राजनीतिक लोकतंत्र बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र को भी शामिल किया गया है। भारतीय लोकतंत्र में सर्वोच्च शक्ति यहां की जनता में निहित है।

5. गणतंत्र – इसका आशय है कि देश का प्रमुख अर्थात राष्ट्रपति चुनाव के जरिए आता है और निश्चित समय के लिए चुना जाता है। राजनीतिक संप्रभुता लोगों के हाथों में होती है और कोई विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग नहीं होता है।

6. न्याय – प्रस्तावना में न्याय तीन भिन्न रूपों मेंं शामिल है- सामाजिक, आर्थिकराजनीतिक। इनकी सुरक्षा मौलिक अधिकार और नीति निदेशक सिद्धांतों के उपबंधों के जरिए की जाती है।
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के इन तत्वों को रूसी क्रांति (1917) से लिया गया है।

7. स्वतंत्रता – स्वतंत्रता का अर्थ है – लोगों की गतिविधियों पर किसी प्रकार की रोकटोक की अनुपस्थिति तथा साथ ही व्यक्ति के विकास के लिए समान अवसर प्रदान करना।
हमारी प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को फ्रांस की क्रांति (1789 – 1799) से लिया गया है।

8. समता – समता का अर्थ समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेषाधिकार की अनुपस्थिति और बिना किसी भेदभाव के सभी व्यक्ति को समान अवसर प्रदान करना है।

मौलिक अधिकारों पर निम्न प्रावधान नागरिक समता को सुनिश्चित करते हैं-

  1. विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14)
  2. धर्म, लिंग, जाति या जन्म के स्थान के आधार पर मूलवंश पर निषेध (अनुच्छेद 15)
  3. लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता (अनुच्छेद 16)
  4. अस्पृश्यता का अन्त (अनुच्छेद 17)
  5. उपाधियों का अन्त (अनुच्छेद 18)

संविधान में दो ऐसे उपबंध हैं जो नागरिक समता को सुनिश्चित हैं-
(¡) धर्म, लिंग व जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल करने के अयोग्य करार नहीं दिया जाएगा (अनुच्छेद 325)
(¡¡) लोकसभा और विधानसभाओं के लिए व्यस्क मतदान का प्रावधान। (अनुच्छेद 326)

9. बंधुत्व – बंधुत्व का अर्थ – भाईचारे की भावना से है। संविधान एकल नागरिकता के सिद्धांत के पालन के आधार पर भाईचारे की भावना का विकास करता है। देश की एकता और अखंडता के लिए यह मनोवैज्ञानिक और सीमाई कारक बहुत आवश्यक है।
इसका उद्देश्य राष्ट्रीय अखंडता के लिए बाधक सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, जातिवाद, भाषावाद इत्यादि बाधाओं को दूर करना है।

प्रस्तावना संबंधित मुख्य वाद
बेरुबारी संघ मामला (1960) में उच्चतम न्यायालय ने कहा की प्रस्तावना संविधान को नहीं सामान्य प्रयोजनों को दर्शाता है और इसलिए संविधान के मस्तिष्क की एक कुंजी है। प्रस्तावना की विशेषता को स्वीकारने के लिए इस उद्देश्य के बारे में व्यवस्था करते हुए Supreme Court ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है।

केशवानंद भारती मामला (1973) – उच्चतम न्यायालय ने पूर्व व्याख्या को अस्वीकार कर दिया और व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है और Preamble (प्रस्तावना) को ध्यान में रखकर संविधान का अध्ययन करना चाहिए।

यह भी जानें: Fundamental Duties 

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