मंडल आयोग | Mandal Commission |

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Mandal Commission
या
इंदिरा साहनी vs.भारत संघ
{ AIR 993. Sc }

इसे मंडल कमीशन (Mandal Commission) के नाम से जाना जाता है, के मामले में Supreme Court ने यह अभिकथित किया कि पिछड़ेपन का निर्धारक तथ्य जाति हो सकती है। इसका अभिप्राय यह है कि Supreme Court ने बालाजी के मामले के निर्णय को इंदिरा साहनी वाद में पलट दिया जिसमें यह कहा गया था कि जाति पिछड़ेपन का निर्धारक तथ्य नहीं हो सकती।

अब यह पूर्णतया स्थापित है कि जाति पिछड़ेपन का निर्धारक तथ्य हो सकती है। इस मामले में यह भी कहा गया कि केवल आर्थिक आधार पिछड़ेपन का निर्धारक तथ्य नहीं हो सकता।

इंदिरा साहनी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा यह भी निर्णित किया गया कि Article 15(4) और Article 16(4) के अंतर्गत पिछड़ापन समान नहीं है क्योंकि Article 16(4) के अंतर्गत पिछड़े वर्ग के लिए Article 15(4) की भांति कोई विशेष शर्त आरोपित नहीं की गई है। Article 15(4) के अंतर्गत शर्त यह है कि ऐसा पिछड़ापन सामाजिक और शैक्षणिक रूप से होना चाहिए।

इसका अभिप्राय यह है कि यदि एक वर्ग को Article 16(4) के अंतर्गत सभी आयामों में तथा राज्याधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के आधार पर पिछड़ा वर्ग माना जाता है तो इसके लिए विशेष प्रावधान बनाया जा सकता है।

Creamy layer का सिद्धांत
अथवा
पिछड़े और अधिक पिछड़े के मध्य अंतर की न्यायोचितता

Article 16 के खण्ड 4 का उद्देश्य पिछड़े वर्ग के उन व्यक्तियों को आरक्षण की सुविधा प्रदान करना है, जो वास्तव में पिछड़े हैं। वे व्यक्ति जो वास्तव में पिछड़े नहीं है उन्हें पिछड़े वर्ग से बहिष्कृत कर देना चाहिए।

Supreme Court ने इंदिरा साहनी के मामले में यह भी निर्धारित किया कि इन वर्गों को बहिष्कृत करने का आधार क्रीमीलेयर है जो पिछड़े और अधिक पिछड़े के मध्य युक्तियुक्त वर्गीकरण स्थापित करता है।

क्रीमी लेयर का परीक्षण वह परीक्षण है जिसके द्वारा पिछड़े वर्ग के वास्तव में पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को पहचाना जा सकता है। S.C ने एक आयोग निर्मित करने के लिए निर्देशित किया जिसके द्वारा क्रीमी लेयर के परीक्षण के आधार पर पिछड़े वर्ग की पहचान की जा सके।
Article 16 (4) का उद्देश्य उन व्यक्तियों को आरक्षण प्रदान करना है जो वास्तव में इसके लिए प्राधिकृत हैं। अतः पिछड़ा और अधिक पिछड़ा वर्ग के मध्य किया गया वर्गीकरण न्यायोचित एवं संवैधानिक है।

यह भी जानें: संविधान की प्रस्तावना

अन्य तथ्य जो इंदिरा साहनी के मामले में निर्णित किए गए –
1. Article 16 का खण्ड (4) खण्ड (1) का अपवाद नहीं है।
2. जाति पिछड़ेपन का निर्धारक तथ्य हो सकती है।
3. अनुुुच्छेद 15 (4) के अंतर्गत पिछड़ा वर्ग तथा अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत पिछड़ा वर्ग समान नहीं है।
4. एक वर्ग के पिछड़ेपन को निर्धारित करने का आर्थिक आधार एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
5. आरक्षण के लिए पिछड़े वर्ग में क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए।
6. पिछड़े और आधिक पिछड़े के मध्य अंतर अनुच्छेद 16 के खंड (4) के अंतर्गत अनुज्ञात है और यह संवैधानिक है।
7. आरक्षण की सीमा 5% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
8. आरक्षण से संबंधित विवाद केवल Supreme Court के अन्तर्गत लाए जाएंगे। High Court और किसी अन्य न्यायालय या निर्धारक निकाय के समझ नहीं।
9. आरक्षण का प्रबंध कार्यपालकीय आदेश द्वारा किया जा सकता है; इसके लिए संसद या विधायिका द्वारा विधि निर्माण करने की आवश्यकता नहीं है।
10. पद्दोनतियों में आरक्षण नहीं होगा।
11. अग्रनयन के सिद्धांत को इस मामले में स्वीकार किया गया।
12. स्थाई सांविधिक निकाय का गठन किया जाना चाहिए जिसके द्वारा पिछड़े वर्ग में दोषपूर्ण तरीके से सम्मिलित किए गए वर्ग समूह का निर्धारण किया जाए।
13. इंदिरा साहनी का निर्णय 9 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिया गया जिसमें न्यायाधीश थामन, कुलदीप सिंह तथा R.M.सहाय ने विपरीत मत व्यक्त किया।

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